ताज़ा ख़बरें

मिशन से बाजार तक :प्रतिरोध से प्रबंधन तक

भारतीय पत्रकारिता का दो शताब्दियों का यात्रा-वृतान्त

भारतीय पत्रकारिता का दो शताब्दियों का यात्रा-वृत्तांत

## मिशन से बाज़ार तक, प्रतिरोध से प्रबंधन तक

भारतीय पत्रकारिता का इतिहास केवल समाचारों का इतिहास नहीं है; यह भारत के सामाजिक परिवर्तन, राजनीतिक संघर्ष, सांस्कृतिक जागरण और लोकतांत्रिक विकास का इतिहास भी है। पिछले दो सौ वर्षों में भारतीय पत्रकारिता ने अनेक रूप बदले हैं — औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध प्रतिरोध का माध्यम बनी, स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज़ बनी, लोकतंत्र की प्रहरी बनी, फिर धीरे-धीरे बाज़ार, तकनीक और कॉरपोरेट संरचनाओं के प्रभाव में बदलती चली गई।

यह यात्रा केवल तकनीकी विकास की कहानी नहीं है; यह उस संघर्ष की कहानी भी है जिसमें “सत्य”, “जनहित” और “सत्ता” के बीच लगातार टकराव होता रहा।

1. प्रारंभिक दौर : औपनिवेशिक भारत में पत्रकारिता का जन्म

भारतीय पत्रकारिता की औपचारिक शुरुआत 1780 में मानी जाती है, जब Hicky’s Bengal Gazette का प्रकाशन James Augustus Hicky ने कलकत्ता से शुरू किया। इसे भारत का पहला मुद्रित समाचारपत्र माना जाता है।

हालाँकि यह पत्र अंग्रेज़ी में था और औपनिवेशिक समाज तक सीमित था, लेकिन इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसने ईस्ट इंडिया कंपनी की आलोचना की। परिणामस्वरूप हिक्की को दमन का सामना करना पड़ा। यहीं से भारतीय पत्रकारिता की पहली पहचान बनी — सत्ता से टकराने की।

उन्नीसवीं सदी में भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता ने सामाजिक चेतना का स्वरूप बदलना शुरू किया। संवाद कौमुदी, समाचार दर्पण और उदन्त मार्तण्ड जैसे प्रकाशनों ने भारतीय समाज में आधुनिक सार्वजनिक विमर्श की शुरुआत की।

राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारकों ने पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन का औजार बनाया। सती प्रथा, स्त्री शिक्षा, धार्मिक कट्टरता और सामाजिक सुधार जैसे प्रश्न पहली बार व्यापक जनचर्चा का हिस्सा बने।

2. स्वतंत्रता आंदोलन और पत्रकारिता : समाचार से संघर्ष तक

बीसवीं सदी आते-आते भारतीय पत्रकारिता स्वतंत्रता आंदोलन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी थी। उस समय अख़बार केवल “न्यूज़” नहीं छापते थे; वे राजनीतिक चेतना पैदा करते थे। पत्रकारिता मिशन थी, व्यवसाय नहीं।

बाल गंगाधर तिलक के केसरी और मराठा ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रवादी चेतना जगाई। तिलक का प्रसिद्ध कथन —
“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” — केवल राजनीतिक नारा नहीं, पत्रकारिता की संघर्षशील आत्मा का भी प्रतीक था।

महात्मा गांधी ने पत्रकारिता को नैतिक और राजनीतिक साधन के रूप में देखा। Young India, Harijan और Indian Opinion के माध्यम से गांधी ने पत्रकारिता को सत्य, आत्मचिंतन और सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा। गांधी मानते थे कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि समाज का नैतिक मार्गदर्शन करना भी है।

इसी दौर में औपनिवेशिक सरकार ने प्रेस पर अनेक प्रतिबंध लगाए। Vernacular Press Act (1878) जैसे कानूनों का उद्देश्य भारतीय भाषाई प्रेस को नियंत्रित करना था। लेकिन दमन जितना बढ़ा, पत्रकारिता उतनी ही प्रतिरोधी होती गई।

3. स्वतंत्रता के बाद : लोकतंत्र और विकास की पत्रकारिता

1947 के बाद भारतीय पत्रकारिता एक नए चरण में प्रवेश करती है। अब संघर्ष विदेशी सत्ता से नहीं, लोकतांत्रिक राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियों से था। इस दौर में पत्रकारिता की भूमिका थी:

* लोकतंत्र को मजबूत करना,
* संविधानिक मूल्यों का प्रसार,
* विकास योजनाओं की निगरानी,
* और नई राष्ट्रीय चेतना का निर्माण।

1950–70 के दशक में प्रिंट पत्रकारिता का प्रभाव अत्यंत मजबूत रहा। अख़बारों को सार्वजनिक बौद्धिकता का केंद्र माना जाता था। संपादकीय लेख सामाजिक विमर्श को दिशा देते थे।

यही वह दौर था जब पत्रकारिता अपेक्षाकृत “संपादक-प्रधान” थी। मालिकों की तुलना में संपादकों की वैचारिक भूमिका अधिक प्रभावशाली मानी जाती थी।

4. आपातकाल : भारतीय प्रेस की सबसे बड़ी परीक्षा

1975 में The Emergency भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।

आपातकाल के दौरान प्रेस सेंसरशिप लागू हुई। समाचार प्रकाशित होने से पहले सरकारी स्वीकृति आवश्यक हो गई। अनेक पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया। इसी दौर में प्रसिद्ध टिप्पणी सामने आई: “जब प्रेस से झुकने को कहा गया, तो वह रेंगने लगा।”

हालाँकि यह पूरी तस्वीर नहीं थी। कई पत्रकारों और अख़बारों ने प्रतिरोध भी किया। The Indian Express और The Statesman जैसे संस्थानों ने सीमित परिस्थितियों में विरोध दर्ज कराया। आपातकाल ने यह स्पष्ट कर दिया कि प्रेस स्वतंत्रता लोकतंत्र के लिए कितनी अनिवार्य है।

5. उदारीकरण और मीडिया का बाज़ारीकरण

1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय पत्रकारिता की संरचना तेजी से बदलने लगी।

* निजी टीवी चैनलों का उदय हुआ।
* 24×7 समाचार संस्कृति शुरू हुई।
* TRP आधारित प्रतिस्पर्धा बढ़ी।
* कॉरपोरेट पूंजी मीडिया में प्रवेश करने लगी।

यहीं से पत्रकारिता धीरे-धीरे “मिशन” से “मीडिया उद्योग” में बदलने लगी।

समाचार अब केवल सार्वजनिक सेवा नहीं रहे; वे उपभोक्ता उत्पाद बनने लगे। इस दौर में सकारात्मक परिवर्तन भी हुए:

* मीडिया का विस्तार,
* क्षेत्रीय पत्रकारिता का विकास,
* तकनीकी आधुनिकीकरण,
* और तेज़ सूचना प्रवाह।

लेकिन साथ ही सनसनीकरण, स्टूडियो बहस, विज्ञापन निर्भरता और कॉरपोरेट प्रभाव भी बढ़ने लगे।

6. डिजिटल युग : सूचना का विस्फोट और सत्य का संकट

इक्कीसवीं सदी में इंटरनेट और सोशल मीडिया ने पत्रकारिता को पूरी तरह बदल दिया।

* अब हर व्यक्ति संभावित “प्रकाशक” बन गया।
* सूचना का लोकतंत्रीकरण हुआ।
* स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म उभरे।

लेकिन इसके साथ नई समस्याएँ भी पैदा हुईं:

* फेक न्यूज़,
* ट्रोल राजनीति,
* एल्गोरिद्मिक ध्रुवीकरण,
* क्लिक आधारित पत्रकारिता,
* और “post-truth” संस्कृति।

आज सूचना पहले से कहीं अधिक है, लेकिन विश्वसनीयता का संकट भी उतना ही गहरा है।

डिजिटल मीडिया ने पारंपरिक मीडिया के केंद्रीकरण को चुनौती दी, लेकिन साथ ही नई टेक कंपनियों और एल्गोरिद्म का नियंत्रण भी स्थापित किया।

Google, Meta और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म अब यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं कि लोग क्या देखेंगे और क्या नहीं।

7. वर्तमान संकट : पत्रकारिता, राष्ट्रवाद और कॉरपोरेट संरचना

आज भारतीय पत्रकारिता अनेक प्रकार के दबावों से गुजर रही है:

* कॉरपोरेट स्वामित्व,
* विज्ञापन निर्भरता,
* राजनीतिक ध्रुवीकरण,
* डिजिटल ट्रोलिंग,
* कानूनी दबाव,
* और दर्शक-आधारित उत्तेजनात्मक मॉडल।

Reporters Without Borders की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग में भारत का निम्न स्थान इसी व्यापक चिंता को दर्शाता है। हालाँकि यह भी सच है कि भारत में आज भी अनेक पत्रकार, क्षेत्रीय मीडिया संस्थान और स्वतंत्र डिजिटल मंच गंभीर पत्रकारिता कर रहे हैं। यानी संकट पूर्ण विनाश का नहीं, बल्कि संरचनात्मक दबावों का है।

8. भविष्य की दिशा : पत्रकारिता कहाँ जाएगी?

भारतीय पत्रकारिता का भविष्य केवल तकनीक तय नहीं करेगी।
उसे समाज की लोकतांत्रिक चेतना भी तय करेगी।

यदि मीडिया केवल मनोरंजन, ध्रुवीकरण और सत्ता-प्रबंधन का माध्यम बनता गया, तो लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होगा। लेकिन यदि स्वतंत्र पत्रकारिता, पाठक-समर्थित मॉडल, सामुदायिक मीडिया और मीडिया साक्षरता को बढ़ावा मिला, तो पत्रकारिता फिर अपनी मूल भूमिका की ओर लौट सकती है।

भारतीय पत्रकारिता की दो शताब्दियों की यात्रा दरअसल भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का प्रतिबिंब है।

उसने औपनिवेशिक दमन देखा, स्वतंत्रता आंदोलन को आवाज़ दी, आपातकाल झेला, बाज़ारवाद का उदय देखा और अब डिजिटल युग की अराजकता का सामना कर रही है।

लेकिन एक प्रश्न आज भी वही है जो दो सौ वर्ष पहले था: “क्या पत्रकारिता सत्ता के साथ खड़ी होगी, या समाज के साथ?”

क्योंकि अंततः पत्रकारिता केवल समाचारों का व्यवसाय नहीं है।
वह लोकतंत्र की सामूहिक स्मृति और जनता के प्रश्न पूछने के अधिकार की संरक्षक भी है।

Show More
Back to top button
error: Content is protected !!